Thursday, August 16, 2012


65 साल की आज़ादी के बाद

आज स्वतंत्रता दिवस के इस पावन मौके पर जब देश 65 साल की आज़ादी के बाद अपना 66 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तो मैं ये समझ नहीं पा रहा हूं कि आज के दिन खुशियां मनाऊं या अफसोस जताऊं। क्योंकि 65 साल की आज़ादी के बाद ऐसी कई चीज़े हैं जिनपर फक्र किया जाए तो वहीं कई चीज़े ऐसी भी जिनपर शर्म आता और दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि इनकी संख्या  है ज़्यादा है।

ऐसा इस लिए हैं क्योंकि शायद देश की मांओं के कोख ने अब्राहम लिंकन और जॉर्ज वॉशिंग्टन सरीखे लोगों को जन्म देना शायद बंद कर दिया है जिनके दूरदर्शीता ने कभी के गुलाम अमेरिका को आज का विकसित अमेरिका बना दिया और दुनिया के सामने विकास की नई परिभाषा दी। जिनको इस देश की मांओं जनमा भी उन्होंने खुद को राजनीतिक परिवेश से दूर रखा। मानो माओं की कोख ने सिर्फ ऐसे लोगों को ही जना जिन्हें भारत के आखरी गवर्नर माउंटबैटन की संज्ञा दी जा सकती है अतिशियोक्ति नहीं होगी। ये सभी जनता के नुमाइंदों ने देश को धर्म, जाति-पाति, अमीर-गरीब, भाषा आदि के नाम पर बांटने की कोशिश करते आ रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। इस प्रयास का जीवंत उदाहरण 'तेलंगाना' का मुद्दा हमारे सामने है।

                                                                   हालात तो इसी ओर कुछ इसी ओर इशारा करते हैं कि हमने इतिहास दोहराते हुए उससे कोई सबक नहीं सीखा है। आज मांग राज्य की है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कल मांग अलग देश की नहीं होगी। बंटवारे के इस नाग ने पहले देश को डंसा जिसका फलस्वरूप पाकिस्तान और बांग्लादेश हमारे सामने हैं। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि पहले की पाकिस्तान और बांग्लादेश तो बंट चुका है और न जाने कितनों का प्रयास होगा। कश्मीर का मुद्दा आज भी बड़े भाई भारत और छोटे भाई पाकिस्तान के बीच कड़वाहट पैदा कर देता है। नतीजा दोनों देशों के सियासतदानों के दिमाग में तनाव और माथे पर बल पैदा करता हो जाता है।  समस्या इतनी विकराल रूप ले रही है या ले चुकी है इसका अंदाज़ा इससे ही लगाया जा सकता है बीते 65 साल में दोनों देशों की सियासी ताक़तें इसका नहीं निकाल पाई हैं।

                                                                   अगर पिछली बातों को छोड़ दें तो भी एक मुद्दा ऐसा है जो देश के सामने मुंह बाए खड़ा है। ये मुद्दा कुछ और नहीं बल्की विकास का है जिसे भारत का हर नागरिक सोते-जागते देखता है। लेकिन शायद लोगों के सोंच की रफ्तार और देश के सियासतदानों के काम करने की रफ्तार में फर्क है तभी देश आज भी देश विकासशील देशों की कतार में खड़ा है। अगर इतिहास के झंरोखे से झांके तो देश के इन माउंटबैटनों संख्य संसद में जितनी भी रही हो (चाहे 15 अगस्त 1947 को नेहरू के मंत्रीमंडल में 19 मंत्रियों की रही हो या फिर आज के यूपीए सरकार के मंत्रीमंडल की) राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव देश ने देखा है, नतीजा आपके सामने है।

                        1947 की 9 करोड़ की आबादी के भारत से लेकर आज के 1 अरब से ज़्यादा आबादी के इंडिया के बदलाव का गवाह देश की आबादी का एक तबका रहा है और बड़ी और जवान होता नसल ने इसे महसूस किया है। लेकिन इन्हीं लोगों ने उन देशों की तरक्की भी देखी है जहां आज भारत का हर नागरिक जा कर पैसा कमाने और बसने का सपना देखता है। दोनों देशों के बीच की खाई भी काफी ज़्यादा और फासला भी। इन देशों ने भारत की आज़ादी के कुल सालों के आधे में खुद को विकसित क़रार दे दिया था। इसका प्रमाण हमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया  और  जापान सरीखे कई देशों से मिलता है,  लेकिन आज भी हम वही हैं 'ढ़ाक के तीन पात', 65 साल में चले भी तो दो कोस।

             दरअसल इस देश के हालात कुछ ऐसे हैं कि राजनीति में कदम रखने वाला हर शक्स खुद को देश का राजा और जनता को अपना निजी दास समझता है। वास्तविक्ता यही है और मुझे लगता है कि अपनी इस बात को साबित करने के लिए किसी साक्ष्य की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इस संबंध में देश के हालात बीते दिनों हुए आंदोलनों में लोगो ने सड़क पर उतर कर और राजनेताओं ने अपनी कुर्सियों से चिपक कर ख़ुद ही साबित कर दिया है। देश के रातनीतिक हालात ऐसे होने के कई कारण हैं जिनपर फिर कभी बात करेंगे।

                                     इन सब के बीच एक तस्वीर और उभर कर सामने आती है, देश के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की। प्रणब दा ने पिछले महीने ही बतौर राष्ट्रपति पदभार संभाला है। लेकिन कल राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रणब दा कुछ ऐसा कह गए जिसे सुन कर राष्ट्रपिता के कदमों पर चलने वालों को बुरा लगा होगा। दा दा ने कहा कि बार-बार आंदोलन करने से देश में अराजक्ता बढ़ती है। इशारा अन्ना हज़ारे और रामदेव के भ्रष्टाचार, कालेधन और लोकपाल कानून को पास करने को लेकर दिल्ली में बार-बार किए गए अनशन और उस अनशन में लोगों के समर्थन की ओर था। लगता है कि प्रणब दा इन बातों को बोलने से पहले ये भूल गए थे कि गांधी जी की इन्हीं अनशनों और आंदोलनों का नतीजा था कि अंग्रेज़ों को देश छोड़ कर जाना पड़ा और आज हम अपना 66 वां स्वतंत्रता दिवस गर्व से मना रहे हैं। लेकिन इस सोच के लिए सिर्फ राष्ट्रपति को ही ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं होगा क्योंकि सन 1946 से ही कांग्रेस ने गांधी जी को पार्टी में सीनीयर सिटिज़न का दर्दा देते हुए धीरे धीरे किनारे करना शुरू कर दिया था। शायद इसी लिए गांधी जी का विश्वास और विचारों की हत्या उस दिन भी हुई थी जिस दिन देश का बंटवारा हुआ था और उनके विश्वास और विचारों की हत्या आज भी कई स्तर पर रोज़ हो रही है।

                                              इन सभी बातों के बीच मैं दोबारा अपने उसी सवाल पर वापस आ गया हूं कि मैं आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर खुशियां मनाऊं या अफसोस जताऊं।

Thursday, June 23, 2011


बचाओ-बचाओ--- सरकार को या जनता को?
आपने वो कहावत तो सुनी ही होगी, 'अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारना'। वर्तमान परिपेक्ष में यूपीए सरकार के सामने कुछ ऐसी ही स्थिति है। यहां पैर यूपीए सरकार और कुल्हाड़ी है अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल। मैंने यहां पर कुल्हाड़ी अन्ना के लोकपाल बिल को इस लिए कहा क्योंकि केंद्र सरकार का जनलोकपाल बिल सं•ावत: उनके पैरों को बचाने के लिए तैयार किया गया है। इस लिए यहां पर यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगी कि केंद्र सरकार का जनलोकपाल बिल •ा्रष्ट और दागी मंत्रियों पर अंकुश लगाने में नाकाम होगा।
उल्लेखनिय है कि इस वर्ष अप्रैल में अन्ना हजारे ने केंद्र सरकार के खिलाफ •ा्रष्टाचार विरोधी मोर्चा खोल दिया था। इंडिया अगेंट्स करपशन के बैनर तले दिल्ली के जंतर मंतर पर परचम बुलंद किया गया। 5 अप्रैल से 9 अप्रैल तक चले अन्ना के अमरण अनशन में पूरा देश उनके साथ खड़ा होगया था। होता •ाी क्यों न, स•ाी •ा्रष्टाचार से त्रस्त जो हैं। हजारे को हासिल •ाारी जन समर्थन के सामने सरकार टिक नहीं पाई। इस बात की औपचारिक पुष्टी केंद्र सरकार के शपथ पत्र ने जंतर मंतर पर कर दी। इसके बाद हजारे ने अपना अनशन •ाी तोड़ दिया।
पांच दिन तक चले इस घठटनाक्रम के बाद हजारे का अनशन तोड़ना देश के आवाम के लिए किसी विश्व युद्ध जीतने से कम न था। इसका बयान जंतर मंतर पर मौजूद लोगों के हूजूम में उत्साह देख कर लगाना मुशकिल नहीं था। उन्हें यह जीत अपनी जीत की तरह दिखाई दी। इसके साथ ही उनमें यह उम्मीद •ाी जागी कि अब •ा्रष्टाचार और •ा्रष्टाचारियों पर नकेल लग पाएगी। लेकिन हजारे की उम्मीद लोगों के विपरीत थी। उन्हें पता था कि सरकार इस बिल को आसानी से पास नहीं होने देगी, क्योंकि इस बिल के पास होने से सबसे पहले उसकी ही गर्दन फंसेगी। ऐसा इस लिए •ाी था क्योंकि हजारे सरकार के रग-रग से वाकिफ थे। इसी वजह से उन्होंने 9 अप्रैल को अनशन की समाप्ति के बाद लोगों से कहा कि इसे जंग का अंजाम नहीं बल्कि आगाज समझें। अ•ाी हर स्तर पर लड़ाई लड़Þनी बाकी है।
सरकार और जनता के नुमाइंदों के बीच बिल के मसौदों पर बात-चीत शुरू हुई। अपनी फंसती गर्दन बचाने के चक्कर में सरकार धीरे-धीरे अपना रंग दिखाने लगी। नतीजतन दोनों नुमाइंदों के बीच की खाई दिन-प्रति-दिन गहराती चली गई। आज हलात यह हैं कि हजारे ने 16 अगस्त से दोबारा अनशन पर बैठने की बात कही है। वजह है जनता के प्रतिनिधियों की 9 और सबसे महत्वपूर्ण मांगे नहीं मानना। यह मांगें निम्न हैं:-
जनप्रतिनिधियों की मांग है कि प्रधानमंत्री को जनलोकपाल की जांच के परिधि में शामिल किया जाए जबकि सरकार इसके खिलाफ में है। सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री को इससे बाहर रखा जाना चाहिए, और अगर लाना और करवाही करनी है तो कार्यकाल समाप्त होने के बाद।
सर्वोच्च न्यायधीश को •ाी जांच के परिधि में होना चाहिए जबकि सरकार इसके विरोध में है।
लोकस•ाा में मंत्रियों का आचरण जनलाकपाल के कार्य के दायरे में होना चाहिए, लेकिन सरकार का कहना है कि ऐसा सं•ाव नहीं है। मंत्रियों को लोकस•ाा का ला•ा लेने का अधिकार है।
सीबीआई और सीवीसी को लोकपाल में सम्मलित होना चाहिए। सरकार यह कह कर इस सुझाव का विरोध कर रही कि दोनों ही संस्थाएं किसी के अधीन काम नहीं कर सकती हैं।
लोकपाल के चुनाव के पैनल में सीवीसी और सीईसी में शामिल हो ना चाहिए। सरकार का कहना है कि है लोकपाल का चुनाव उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रियों के द्वारा होना चाहिए।
स•ाी नौकरशाहों को जनलोकपाल की जांच परिधि में शामिल किया जाना चाहिए जबकि सरकार सिर्फ उच्च नौकरशाहों को जांच के दायरे में लाना चाहती है।
लोकपाल को प्रासिक्य्शन और फोन टेन करवाने का अधिकार होना चाहिए जबकि सरकार दोनों ही सुझावों के विरोध में खड़ी है। सरकार का कहना है कि जनलोकपाल को प्रासिक्य्शन का अधिकार नहीं दिया जा सकता है और जहां तक फोन टेप करवाने का सवाल है तो लाकपाल को इसके लिए गृह सचिव से अनुमति लेनी होगी।
जांच में दोषी पाए जाने की दशा में आजीवन कारावास का प्रावधान होना चाहिए जबकि सरकार सजा को महज दस साल रखना चाहती है।
लोकपाल को हटाने के लिए कोई •ाी नागरिक सर्वोच्च न्यायलय में अर्जी दाखिल दे सकता है वहीं सरकार चाहती है कि यह अधिकार सिर्फ सरकार के पास रहे।
इस स•ाी मामलों में सरकार की लोगों के प्रति ना फरमानी सरकार की •ा्रष्टाचार के प्रति सरकार का जागरुक रवैए को दिखाता है। बहरहाल •ा्रष्टाचार को लेकर चौतरफा वार झेल रही यूपीए सरकार एक और पुरानी कहावत की सार्थक्ता सिद्ध करती दिखाई देती है। इस बार 'खिसयानी बिल्ली खं•ाा नोचे'। लेकिन इस बार बिल्ली ने सिर्फ खं•ाा ही नहीं नोचा बल्कि पंजा •ाी मारा जिसमें कई लोग घायल हो गए। मैं बात कर रहा हूं बाबा रामदेव की जो काले धन को •ाारत लाने और उसे राष्ट्र सम्पत्ति घोषित करने की मांग को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में 4 जून से शांतिपूर्ण तरीके से अनशन पर बैठे थे। सरकार ने अपनी दबंगई दिखाते हुए निहत्थे लोगों को पुलिस के हाथों पिटवाया।
इन स•ाी बातों से यही लगता है कि सरकार, पाकिस्तान की तरह दोहरी बात कर रही है। जैसे पाकिस्तान •ाारत और दुनिया से आतंकवाद के खिलाफ कारवाई की बात   तो कहता है, लेकिन कारवाई एक नहीं करता उल्टे उसे बढ़ावा देता है। ठीक उसी तरह केंद्र सरकार •ाी •ा्रष्टाचार की खिलाफत करती है लेकिन अपनी नितियों से उसे बढ़ावा •ाी देती है। यहां सवाल इस बात का है कि बचाओ- बचाओ की पुकार सरकार को देश वासियों की सुनाई देती है या •ा्रष्टाचार में अपने दामन को मलीन करने वाले नेताओं की। •ाारत का आने वाला •ाविष्य वही तय करेगा।

Saturday, February 19, 2011


गांधी जी की पूछ आज ज्यादा है

मोहन दास करमचंद गांधी जिन्हें हम गांधी और बापू के नाम से भी जानते हैं, की पूछ शायद आजादी के लिए उतनी नहीं रही होगी जितनी आज आजादी के बाद है। आप सोच रहे होंगे कि मैं यह क्या कह रहा हूं। तो मैं आपको बता दंू कि मैं आज के गांधी जी यानिकि रुपए की बात कर रहा हूं। आज गांधी और उनकी कही बातेें तो किसी को याद तो नहीं हैं लेकिन रुपए के लिए सब पागल हैं। चाहे वह जैसे भी आए, आना चाहिए। क्योंकि रुपए तो रुपए होते हैं। इस जन्मजात बीमारी से आम जनता और यकीन्न हमा राजनेता भी ग्रसित हैं। तभी तो आए दिन कोई न कोई  ोटाला सामने आ रहा है। शुरुआत राष्ट्रमंडल खेल  ोटले से हुई। इसके बाद तो जैसे  ोटाले उजागर होने का दौर ही शुुरु हो गया हो। २जी स्पेक्ट्रम, आर्दश सोसायटी और न जाने कितने ही इस कतार में अपना नाम गिने जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन मैं उनका नाम लेकर उनकी शाने चार चांद नहीं लगाना चाहता।
बात यहां रुपए की प्रभुत्व की और भी पुख्ता हो जाती है कि प्रधानमंत्री तक खुद को इसके आगे बेबस बताते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों के साथ हुई बैठक से इस बात को और बल मिलता है। बैठक में प्रधानमंत्री ने साफ तौर पर कहा कि वे बेबस हैं। गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती हैं। इनके अंदर रह कर ही सरका को काम करना होता है। 
चलो यह सब तो राजनीतिक बातें थी। सरकार के मन में क्या है यह जग जाहिर है। सरकार किसी भी तरह अपनी कुर्सी बचाना चाहती है। इसमें प्रधानमंत्री भी पीछे नहीं हैं। वह भी अपनी कुर्सी और उसके जाने के बाद का प्रबंध कर लेना चाहते हैं। इसके लिए उनके पास मात्र तीन वर्षों का समय शेष है। इसी लिए वह ऐसे बयान दे रहे हैं। लेकिन सोचने वाली बात है कि आखिर क्या वजह है कि इस सरकार के दौरान इतने सा  ोटाले हुए और वह भी इतनी आसानी से। इस सवाल के जावाब में अगर केंद्र सरकार यह कहे कि उसके पास इस सवाल का जवाब नहीं है तो मैं यह ही कूंगा कि यह बात कुछ हजम नहीं हुई। ऐसा हो ही नहीं सकता कि नेता सरकार के नाक के नीचे से उसकी मंूछ काट कर ले जाए और सरकार को पता ही न चले। शक यह भी होता है कि कहीं इन सब में सरकार भी बराब की भागेदार है। यह सवाल मे मन में ही नहीं बल्कि पू भारतवासियों के मन में उठ रहा होगा। इस सवाल का जवाब किसी बे़ से पूछने पर तो आसानी से मिल ही जाएगा। लेकिन आज कि माहौल में इस सवाल का जवाब एक बच्चा भी दे देगा क्योंकि उसे यह पता है कि जनता के साथ होने का दम भरने वालों का असली चेहरा क्या है। सरकार के लिए इज्जत कितनी है एक गरीब से बेहतर कोई नहीं बता पाएगा क्योंकि इस र्दद हो वह ही समझ सकता है जो रातों को पेट अपनी पीठ से जो कर सोता है। दलितों के  रों में जा कर राजनीति करने से यह बात छिप नहीं जाती। 
आज गांधी की उपयोगिता इतनी ज्यादा है कि कोई बिगत़ा काम इसके प्रयोग से आसानी से बन सकता है। इसका जीवंत उदाहरण नीरा राडिया और बे़ उद्योग  रानों के लिए हुई लॉबिंग से लगा सकते हैं। यह सिर्फ बे़ स्तर पर ही नहीं बल्कि छोटे स्तर पर भी शुरु हो जाता है। चाहे वह एक सरकारह दफतर का प्यून की क्यों न हो। चाय पानी की मांग तो जैसे उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। इन सब बातों कोच कर गुस्सा आता है लेकिन यह सोच कर खुद ही चुप हो जाता ूं कि यहां पर कुछ  तक कुछ नहीं हो सकता जब तक हम नकली गांधी जगह असली गांधी को नहीं देेते।


Wednesday, February 16, 2011


प्रधानमंत्री के बयान पर अफसोस होता है!

देश में बढ़ते •ा्रष्टाचार को लेकर केंद्र सरकार हर तरफ से घिरती दिखाई दे रही है। एक तरफ विपक्ष और वामदल तो दूसरी तरफ देश की करोड़ से •ाी अधिक की जनता। जिसकी उम्मीदों पर आघात ख्ुाद केंद्र सरकार ने ही किया है। आसमान में उड़ती सरकार जमीन पर तो आनी ही थी। हुआ •ाी यही। अपने सरकार के बचाव में प्रधानमंत्री खुद सामने आए। या यूं कहें कि प्रधानमंत्री को तुरुप के इक्के की तरह •ोजा गया।
प्रधानमंत्री आए और मीडिया के सामने अपने हार और लाचारी की दास्तान परोस दी। प्रधानमंत्री ने कहा कि गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती हैं। केंद्र सरकार •ाी कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रही है। पूर्व टेलिकॉम मंत्री ए राजा कांग्रेस की नहीं डीएमके के खास थे। डीएमके के सुझाव पर ही राजा को टेलिकॉम मंत्री बनाया गया था। इन विरोधा•ाासी बयानों के बाद लागों की प्रतिक्रियाएं आनी तो स्व•ााविक थीं। ऐसा हुआ •ाी। कुछ ने प्रधानमंत्री को धृतराष्ट्र बोल डाला तो कुछ ने उनसे इस्तीफे की मांग कर डाली। आखिर हो •ाी क्यों न, उन्होंने •ाी कई बार बच्चों की तरह बायान दिये जिससे लोगों की •ाावनाए तो आहत हुई ही, विरोधियों को राजनीति करने का एक और बना बनाया मुद्दा मिल गया। जिस पर राजनीति •ाी उम्मीद के मुताबिक देखने को मिली। 
इन सब के बाद •ाी प्रधानमंत्री के झुकी हुई रीढ़ वाले नेताओं सरीके बयान ने कुछ सवाल खडेÞ कर दिये। इनका जवाब होने पर •ाी शायद प्रधानमंत्री देना नहीं चाहेंगे। सवाल जैसे क्या गठबंधन सरकार की मजबूरी के नाम पर •ा्रष्टाचार को जायज ठहराया जा सकता है? क्या प्रधानमंत्री की बात का यह मतलब निकाला जाना चाहिए कि उन्होंने एक तरह से यह साफ कर दिया है कि इस सरकार के रहते •ा्रष्टाचार को रोकना सं•ाव नहीं है? क्या प्रधानमंत्री ने घोटालों का दोष जनता पर ही मढ़ दिया है, क्योंकि  जनता ने कांग्रेस को पूर्ण बहुमत से सत्ता में नहीं लौटाया? और सबसे अंत में सबसे जरूरी सवाल कि क्या प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारियों से बच सकते हैं?
अगर इन सवालों का जवाब देश की आम जनता जो रोज दो वक्त की रोटी के लिए •ाागती दौड़ती है तो जवाब सबको पता है क्या मिलेगा। हमारी सरकार को यह सोचने की आवश्यक्ता है कि क्या सरकार को सोचने की जब हर जगह सरकार की मट्टी पलीत हो रही है तब उसे क्या करना चाहिए? वह काम जो वहा अब तक करती आई है या वह काम जिसके लिए देश की जनता ने उसे चुना था?

Thursday, December 16, 2010

उत्तर प््रादेश: अनाज घोटाला

लगता है जैसे कि देश में घोटालों के उजागर होने की हवा चली है। रोज नित नये घोटालों का उजागर होना जहां एक तरफ इस बात को हवा दे रहा है की देश में भ्रष्टाचार रोज नयी ऊंचाईयां छू रहा है, जिसने सरकारी दावों की कलई खोल कर रख दी है वहीं दूसरी तरफ यह भी साबित कर दिया है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक आम आदमी की दशा क्या है?

जहां एक ओर लोकतंत्र विफल होता दिख रहा है वहीं दूसरी ओर मीडिया की सामाजिक भागीदारी भी सामने आ रही है। २ जी स्पेक्ट्रम आबंटन घोटाले के बाद मीडिया के ही माध्ययम से अभी तक का देश का सबसे बड़ा घोटाला सामने आया है। यह घोटाला मायावती शासित उत्तर प्रदेश में किया गया जिसकी रकम २ लाख करोड़ बतायी जा रही है। प्रदेश के बट्टेदारों, नौकरशाहों और सफेद पोशों नेताओं ने केन्द्र द्वारा सरकारी स्कीमों:- जवाहर रोजगार योजना, मिड डे मील और बी० पी० एल० के तहत दिये गये अनाज को न सिर्फ प्रदेश के बाहर बल्कि देश के बाहर नेपाल और बंग्लादेश में काला बाजारी कर मोटी मलाई काटी गई और अनाज के वास्तविक हकदारों को इसकी भनक तक नहीं होने दी।

स्पेशल इन्वेस्टीगेटिव टीम (एस० टी० आई०) और सी०बी०आई द्वारा की गई जांच में कई चौंेका देने वाले तथ्य सामने आये हैं। जैसे- अनाज की इस कालाबाजारी के लिये न र्सिफ ट्रकों बल्कि माल गाड़ियों का भी इस्तेमाल किया गया। जिन ट्रकों का इस्तेमाल हुआ उनके नंबर प्लेट फर्जी थे। जांच के तार कोलकाता के पी० के० एस० लिमिटेड कम्पनी तक भी पहुंचे जिससे साबित हुआ कि अमुख कंपनी ने इस पूरे घोटाले में प्रमुख भूमिका निभाई है।
जहां इसकी आंच प्रदेश विधान सभा तक पहूंची वहीं दूसरी तरफ देश की सबसे बड़ी पंचायत में भी इसकी गूंज बखूबी सुनाई पड़ी। इसके साथ ही जहां दानों पार्टीयों (बसपा और सपा) के नेताओं मायावती (र्वतमान मुख्य मंत्री- चौथी बार)और मुलायम सिह यादव (पूर्व मुख्स मंत्री- तीसरी बार) को सियासत खेलने का एक और मुद्दा मिल गया है वहीं उत्तर प्रदेश में सरकारी तंत्र की कलइ्रर् खोल कर रख दी है। वास्तविक्ता तो यह है कि वर्ष २००२-०७ के पांच वर्षों के अंतराल में दोनों ही मंत्रीयों ने प्रदेश के मुख्य मंत्री का कार्यभार सम्भाला था। ३ मई २००२ से २९ अगस्त २००३ में मायावती तीसरी बार मुख्य मंत्री बनीं तो वहीं २९ अगस्त २००३ से १० मई २००७ तक मुलायम सिंह यादव तीसरी बार मुख्य मंत्री के पद पर बैठे थे और पुन: १३ मई २००७ से अब तक मायावती प्रदेश की मुख्य मंत्री बनी हुई हैं।

अनाज की बोरियों में बंद इस घोटाले ने जहां एक तरफ यह साबित किया है कि प्रदेश सरकारें गरीबों के हितों का कितना ध्यान रखते हैं वहीं यह भी सिद्ध किया है कि नेता और नौकरशाह अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये कितने नीचे गिर सकते हैं। इस पूरे मामले की जांच हाई कोर्ट के निर्देष पर सी०बी०आई द्वारा कि गयी जो कि पहले सुविधाओं की कमी का हवाला देते हुए पूरे मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही थी। लेकिन इस घोटाले में कौन कौन शामिल हैं उनके नाम अभी सामने नहीं आ पाये हैं। लिहाजा जांच एजेंसीयां अब भी वहीं पर खड़ी हैं जहां वह पहले दिन खड़ी थीं क्योंकि उनके पास सवाल तो कई हैं लेकिन जवाब एक भी नहीं सूझ रहा है। इन सवालों में से जो सबसे अहम सवाल है कि आखिर जांच शुरू की जाये तो कहां से? उत्तर प्रदेश में कुल ७० जिले हैं और अभी तक जो कुछ भी सामने आया है वह सिर्फ ४० जिलों का काला चिट्ठा है, यानी कि अभी ३० जिले जांच की जद में नहीं आये हैं।

वर्ष २००६ में मुलायम सिंह द्वारा ई० ओ० डब्लू (इकोनॉमिक ऑफिस विंग) से कसई जांच में र्सिफ बलिया जिले में ही ५० केस र्दज किये गये थे। जैसे जैसे जांच आगे बढ़ेगी वैसे इस सम्भावना को और बल मिलता जायेगा कि घोटाले की यह रकम अभी और बढ़ सकती है। वैसे यह भी बताते चलें कि देश का दामन काफी पहले से घोटालों के दागों से दागदार होता रहा है। चाहे वह २ जी स्पेक्ट्रम आबंटन का घोटाला हो या फिर शहीदों के लिये बने मकानों वाला आर्दश सोसाईटी घोटाला या राष्ट्रमण्ड खेल घोटाला या कॉफिन घोटाला या फिर बोर्फोस घोटाला, इन सभी दो बातें सिद्ध की है। पहला यह कि इनकी संख्या इतनी है कि शायद आप अपनी अंगुलियों पर भी गिन न पायें और दूसरी कि हमारे देश में भ्रष्टाचार पिछले दशकों की अपेक्षा बढ़ी है।

Monday, November 29, 2010

क्या हमने भ्रश्टाचार को अपना लिया है?

क्या हमने भ्रश्टाचार को अपना लिया है, सवाल छोटा मगर बेहद जटिल और हमारी समाजिक जड़ों को हिलाने वाला है। आप भले ही इसे झूठ कहें लेकिन वास्तविक्ता तो यही है कि हमने भ्रश्टाचार को अपने जिन्दगी में अपना लिया है और अब हमारा प्रतिक्रिया इसके प्रति उतनी सजग नहीं रही जितनी की एक द ाक पहले हुआ करती थी। कहा जा सकता है कि हम अब परिपक्व हो गये हैं। हमारे अंदर यह परिपक्वता भाायद इस लिये भी आ गई है क्यों कि हम भ्रश्टाचार के आदि हो चुके हैंं। अभी हाल की ही बात ले लीजिये, कुछ ही दिनों पहले कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़े भ्रश्टाचार के मामले का हल सरकार निकाल ही नहीं पायी थी कि उसके बाद आर्द ा सोसाइटि घोटाला, २ जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आ गया। र्वतमान हालात को देखते हुए ऐसा लगता है कि जैसे घोटालों का परदाफा ा करने के लिये एक बयार सी चली हो जो सारे घोटालों की परते उधेड़ती जा रही है।
लेकिन अगर भ्रश्टाचार के प्रति हमारी उदासीनता का सकारात्मक पहलू देखें तो अब सरकारें इसके नाम पर वोटों की फसल नहीं काट सकती हैं। ऐसा इस लिये है क्यों कि हम वह भली भंती जान चुके हैं कि चाहे वह कोई भी पार्टी हो, उसके दामन भी भ्रश्टाचार के दागों से बचे नहीं हैं। आखिर कार चोर चोर मौसेरे भाई जो होते हैं।
खास बात यह है कि ये उदासीनता हमारे दो रवैयों को प्रस्तुत करती है। पहला यह कि अब हम भ्रश्टाचार से ऊब गये हैं क्यों कि हमने यह मान लिया है कि ऐसा तो होना ही है। दूसरा पहलू यह है कि हमारा मध्ययम वर्गीय समाज की दिलचस्पी राजनीति की ओर न हो कर अपने भविश्य, महंगाई और रोज मर्रा के कामों में भागते बीतती है। रही बात गरीब तबके की या उनकी जो गावों में रहते हैं, उन्हें तो चुनावों के दौरान कुछ रूपयों, उपहारों, भाराब की बोतलों और बिरयानी की पैकटों से आसानी से खरीदी जा सकता है और जो की असल जिन्दगी में किसी से छिपा नहीं है।
ल्ेिकन पूरे दे ा की जड़ों में आपनी पैठ बना चुकी इस भ्रश्टाचार के लिये हम सिर्फ सरकारों और न्यायिक प्रक्रिया को दोशी नहीं ठहराया जा सकता। वास्तविक्ता यह है कि हम भी इस भ्रश्टाचार के विस्तार में बराबर के दोशी हैं। हमने अपने और दूसरों के लिये भ्रश्टाचार की दो परिभाशाऐं, दो मानक बना रखें हैं। यदि भ्रश्टाचार से हमें फायदा हो रहा है तो वह सही है और भ्रश्टाचार नहीं है और कहीं अगर नुक्सान या गलत हो रहा हो तो वह भ्रश्टाचार है। फलस्वरूप हम उसके लिये हायतौबा मचाने लगते हैं।
विद्वानों के बीच में अरसे यह मुददा सुर्खियों में रहा है और इसके हल के लिये तीन उपाय सुझाये हैं जो कि मेरे विचार से व्यर्थ हैं। तीन में से एक तरीका जो सुझाया गया वह है 'सख्त कानून व्यवस्था और केसों का तेज निपटारा।` जहां यह सुझाव हमारी लोचपूर्ण और लचर न्याय व्यवस्था की ओर इ ाारा करता है वहीं एक सवाल भी खड़ा करता है कि जब र्वतमान परिपेक्ष में गवाहों और सबूतो को आसानी से खरीदा या मिटाया जा सकता है तो क्या यही केसों के तेज निपटारे के वक्त नहीं होगा? मुझे नहीं लगता कि यह कोई असम्भव कार्य है। दूसरा तरीका जो सुझाया गया वह यह कि सरकारी कार्यों में पारदि र्ाता का स्तर इतना बढ़ा दिया जाये कि सब कुछ लोगों की आंखों के सामने हो। मेरे विचार से भाायद इसी सुझाव पर काम करते हुए सरकार ने सूचना का अधिकार कानून को अस्तित्व में लाई थी जिसने सरकारी कार्यों में पारदि र्ाता का स्तर काफी बढ़ा दिया है। लेकिन वास्तविक्ता यह है कि यह अधिकार भी एक हद पर जा के समाप्त हो जाता है। तीसरा सुझाव था कि लोगों को भ्रश्टाचार के प्रति जागरूक बनाया जाये ताकि वे उसके खिलाफ उचित कदम उठा सकें। मैं अगर सही कहंू तो सबसे ज्यादा ना उम्मीद मुझे इसी सुझाव ने किया है क्योंकि जब हमने भश्टाचार को अपना रखा है तो उसे कैसे हटा सकते हैं। यह एक कटु सत्य है कि अपने अपने स्तर पर हम सभी भ्रश्ट हैं और उसे बढ़ावा देते हैं।
लेकिन जो सबसे डरावना पहलू है वह यह है कि जब किसी समाज में भ्रश्टाचार को अपने लिये जाता है तो उस समाज में भ्रश्टाचार की कोई सीमा नहीं रह जाती है और जिसे रोकना नामुमकिन हो जाता है। मेरा यह लेख सीधे तौर पर दे ा की एक भयावह चेहरा प्रस्तुत कर रहा है लेकिन वास्तविक्ता यही है।
बिहार का जनमत

अभी हाल ही में हुये बिहार विधान सभा चुनावों में नितीश कुमार और भाजपा गठबंधन ने दोबारा बाजी मार ली है। ऐेसा जनमत तो स्वभाविक था लेकिन लागों का इतना झुकाव और सर्मथन का सपना तो नितीश ने भी नहीं देखा होगा और इसमें कोई शक नहीं कि दोनों ही खुशी से फूले नहीं समा रहे होंगे। ऐसा होना भी चाहिये था क्योंकि बिहार में नितीश ने वो कर के दिखाया था जो कि प्रदेश के इतिहास में कभी नहीं हुआ। हां लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के वक्त बिहार आगे तो नहीं आया लेकिन १५-२० साल पीछे जरूर चला गया। एक वक्त था जब बिहार में यह कहावत प्रचलित थी 'जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक रहेगा बिहार में लालू।` आज समोसे में आलू तो है लेकिन बिहार में लालू नहीं। पिछली बार की तरह इस बार भी चुनावों में लालू प्रसाद यादव को मुंह की खानी पड़ी लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछली बार तो कम लेकिन इस बार कहीं ज्यादा खानी पड़ी है।
बिहार में राजनीतिक समीकरणों के बदलने की वजह साफ है, अब बिहार की जनता उन्नती चाहती है। अब उसे और बरगलाना किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिये आसान न होगा जो कि इस बार के जनाधार से साफ हो गया है। बिहार की जनता का यह स्भाव स्भाविक भी है, जब सब आगे बढ़ रहे हैं तो बिहार आखिर पिछड़ेपन की मार कब तक झेलता रहेगा? कब तक उसके साथ सौतेलों सरीके व्याहार होता रहेगा? बिहार के पिछड़ेपन की गवाही सिर्फ लोग ही नहीं बल्कि आंकड़े भी कुछ इसी ओर ईशारा करते हैं। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या फिर कोई और, बिहार अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे खड़ा नजर आता है। अगर प्रति व्यक्ति आय की बात की जाये तो पूरे देश की प्रति व्यक्ति आय जहां ४० से ५० हजार सालाना के बीच है वहीं बिहार की १३ हजार से कुछ अधिक पर दम तोड़ देती है।
अगर बिहार और उसके लोगों के साथ हुए सौतेलेपन की बात करें तो दोनों ही राजनीतिक और व्यक्तिगत तौर पर बिहार के साथ काफी अन्याय हुआ है। कई पंच वर्षिय योजनाओं में प्रदेश को केंद्र से पूरा पैसे हासिल नहीं हुये और व्यक्तिगत तौर पर बिहार के नागरिकों के साथ महाराष्ट्र, दिल्ली और देश के अन्य राज्यों में कैसा व्योहार होता है जग जाहिर है। पिछले दशकों में बिहार में कोई नया उद्योग नहीं लगा और जिन्होंने प्रदेश में निवेश किया था वे भी जाते रहे। अब जब नितीश को जनता ने दोबारा चुन कर मुख्यमंत्री के पद पर बैठाया है तो उनके पास वापिस से पांच साल का वक्त उस नींव पर ईमारत खड़ी करने के लिये जो कि उन्होंने पिछले पांच सालों मंे अपने कार्यकाल के दौरान डाली थी।