Tuesday, May 18, 2010


टी-20 वर्लड कप नहीं तो अजलन शाह कप जीता

भारत भले ही टी-20 वल्र्ड कप पर कबजा नहीं कर पाया मगर हाकी मौजूदा चैंपियन ने सुलतान अजलन शाह जीत लिया है। भारत को यह कप साउथ कोरिया के साथ बांटना पडा। इन दोनों टीमों के बीच फाइनल मैच शुरू हुआ लेकिन छह मिनट बाद ही तेज बारिश के वजह से रोकना पडा। काफी देर के इंतजार के बाद आयोजकों ने मैच समाप्ति की घोषणा कर दी। 1983 में शुरू हुये इस टूर्नामेंट में यह पहले मौका था जब दो टीमों को संयुक्त रूप से विजेता घोषित किया गया है। इसके साथ ही भारत के राइट फुलबैक सरदार सिहं को टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाडी घोषित किया गया।

नई दिल्ली स्टेशन पर भगदड से रेलवे की खुली पोल

अभी शुरूआत हुई नहीं कि नई दिल्ली स्टेशन पर व्यवस्था चारो खाने चित नजर आई। रवीवार को रेल्वे स्टेशन पर भगदड मच गई जिसमें 2 लोगों की मौत हो गई और 8 घायल हो गये। यह हादसा दो ट्रेनों सप्तक्रांति एक्सप्रेस और विक्रमशिला के यात्रियों के बीच ट्रेन पकडने की हडबडी की वजस से सामने आया। दरअसल दोनों ट्रेनों के आने का समय तकरीबन एक ही है। दोनों के आने से पहले घोषणा हुई कि सप्तक्रांति प्लेटफार्म नं0 13 पर आयेगी और वक्रमशिला प्लेटफार्म नं0 12 पर। दोनों ट्रेनों के यात्री नीयत लेटफार्म और फुटओवर ब्रिज पर ट्रेन की आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन ट्रेनें ठीक उसकी उलट प्लेटफार्मों पर आयी। यानीकि सप्तक्रांति प्लेटफार्म नं0 12 और प्लेटफार्म नं0 13 पर आगई। दोनों ट्रेनों के छूटने का समय करीब पौने तीन बजे था। इसी लिये लोगों के ट्रेनों को लेकर अफरातफरी मच गई और यह हादस हो गया। इस हादसे पर रेल मंत्री मामता बैनर्जी का बयान आया, ‘‘यह प्रशासन की नाकामी नहीं है, इसके लिये लोग भी जिम्मेदार हैं। ऐसे हालात को कंट्रोल करना कठिन है।’’

हादसे के प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि जिस फुटओवर ब्रिज की सीढीयों पर यह हादसा हुआ, वहां तिल रखने की जगह भी नहीं थी। दरअसल, इस स्टेशन का यही एक ऐसा फुटओवर ब्रिज है, जो यात्रियों का सबसे ज्यादा बोझ ढोता है। चुंकि यही फुटओवर ब्रिज दोनों सिरों पर (अजमेरी गेट और पहाड गंज) की मेन एंट्री है इसलिये इस पर सबसे ज्यादा भीड होती है। हालांकि निजामुद्दीन एंड पर भी एक फुटओवर ब्रिज है लेकिन वह भी अधुरा है। यही वजह है कि उसका इस्तेमाल नहीं हो पाता है। लगभग पांच साल पहले जब इस तरह भगदड मची थी, तब इसकी जांच के लिये एक कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी ने अपनी रीपोर्ट में कहा था कि आधे अधूरे फुटओवर ब्रिजों का निर्माण कार्य पूरा किया जाये जिससे कि 1 नं0 फुटओवर ब्रिज पर यात्रियों के बोझ को कम किया जा सके। लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी इसका निर्माण कार्य अभी तक चल रहा है।

राजनीति का नया दाव - जाती आधारित जनगणना

मैं यू0 पी0 के एक शहर गोरखपुर से ताल्लुक रखता हूं। यह शहर बडा तो है मगर राजधानी लखनऊ की तरह अखबारों की सुर्खियों में नहीं रहता है। लेकिन राजनीतिक हल्कों में शहर को काफी तवज्जो मिलती है। यहां अक्सर लोग आपको घरों में आफिस के खाली वक्त में और चाय की दुकानों पर तो खास कर लोग राजनीति पर अपने विचारों का आदान प्रदान करते मिल जाते हैं। जब मैं छोटा था तब मैं ये सोचा करता था कि बडों को कोई और काम नहीं है क्या जो र्सिफ राजनीति पर बातें करते हैं पर जब मैं बडा हुआ तो कुछ मुद्दों पर मैंने भी खुद को राजनीति पर बात करते पाया। मैंने र्सिफ खुद को ही नहीं बल्कि अपने दोस्तों और अपने ही उम्र के कई और लडकों को राजनीति पर विचार विर्मश करते पाया।

अगर मैं र्सिफ शहर की बात न करके पूरे राज्य की बात करूं तो ये राज्य संप्रदायिक्ता में बंटा हुआ है। इसी वजह से राज्य में संप्रदायिक दंगे भडकाना कोई कठिन कार्य नहीं है। अक्सर ये दंगे राजनीतिक लाभ के लिये भडकाये जाते हैं। इस बात को लोग भी जानते हैं मगर सब के बावजूद दंगे की आग से खुद को बचा नहीं पाते हैं और इसी आवेग में आ कर वो कुछ ऐसा कर बैठते हैं जो वे नहीं करना चाहते थे या उल्हें नहीं करना चाहिए था। इस पर बाद में राजनीति भी खूब होती है और विपक्ष को बैठे बिठाये मौजूदा सरकार के खिलाफ एजेंडा मिल जाता है। इस एजेंडे को चुनाव के दौरान मुद्दा बनाकर खूब राजनीतिक रोटियां भी सेकी जाती हैं।

इस जाति आधारित राजनीति को और बढावा देने के लिये कुछ पार्टियों ने जाति आधारित जनगणना करवाने का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा जिसे सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया। इस पर पार्टी नेताओं ने विरोधा प्रर्दशन किया और संसद की कार्यवाही बीच में ही छोड कर बाहर चले आये। उन्होंने मीडिया के सामने बयान दिया कि जब देश में विभिन्न जाती के लोग रहते हैं ता जनगणना जाति के आधार पर क्यों नहीं हो सकती? जब यह एक वास्तविक्ता है तो सरकार इसे क्यों नहीं मान रही है?

देखा जाये तो अगर जनगणना जाति के आधर पर की जाये तो इससे ये जरूर मालूम पड जायेगा कि पूरे देश में और विभिन्न राज्यों में रह रहे नगरिक किस जाती में कितनी संख्या में हैं। इस जाति आधारित जनगणना से लोगों को तो लाभ होने की संभावना तो नगण्य है और सीधे तौर पर लाभ राजनीतिक पार्टियों को होगा जो सीधे साधे जाती आधारित राजनीति करती हैं। इसका सरल शब्दों में अर्थ ये निकलता है जो राजनीति पहले वोट बैंक के तौर पर होती थी वह अब जाति आधारित वोट बैंक पर केद्रिंत हो जायेगी। सपाट शब्दों में राजनीति भी अब और गणित आधारित हो जायेगी। अगर कोई पाटी यह देख रही है कि जीत के लिये उनका वोट बैंक कम पड सकता है तो वह चुनाव प्रचार में वोट खीचने हेतु कुछ और लोक लुभावने वादे कर सकती है। मस्लन मायावती की बहुजन समाज पार्टी जो दलितों की पार्टी मानी जाती है (जो धीरे धीरे दलितों के अलावा अब ब्रहमणों आदि पर भी केंद्रित होती जा रही है और जिसका परिणाम पिछले मुख्यमंत्री चुनाव में बसपा के जीत के तौर देखने को मिला) उसके पास सरकारी आंकडा होगा कि उ0 प्र0 में कितने दलित हैं और कितने अन्य जाति के लोगों की संख्या क्या है। मुलायम सिहं यादव की समाजवादी पार्टी जो मुस्लिम वोटों पर आधारित है उसके पास भी मुस्लिमों (अल्पसंख्यकों) की और अन्य जातियों से संबधित सरकारी दस्तवेज होगा। राम मंदिर और हिंदुत्व को मुद्दा बना चल रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हिंदू वोट बैंक और कांग्रेस अपनी जाती आधारित राजनीति खेलेगी। इस तरह की राजनीति में एक विशेष वर्ग को सहूलियत मिलेगी और दूसरा वर्ग सौतेले व्योहार का भावना बढती जायेगी। इसका सीधा असर राज्य सरकारों की नीतियों पर भी पडेगा।

बहुत से नेता इस जाति आधारित जनगणना के पक्ष में एक दूसरे से हाथ भी मिला रहे हैं। वे चाहते हैं कि यह बिल सरकार द्वारा पास हो जाये ताकी उनके हाथ जाति आधारित चाभियां लग जाये और आवश्यक्तानुसार वे राजनीतिक लाभ के लिये इनका इस्तेमाल कर सकें। इससे कुछ ही दिनों में वे लोग जो सरकारी नीतियों से अछूते रह गये, त्रस्त हो जोयेंगे। धीरे धीरे ये भावना उनके अंदर बढती चली जायेगी और हो सकता है कि एक दिन तेलंगाना की तरह लोग जाति आधारित राष्ट्र की मांग कर दें। हमारे राजनेताओं को सोचना होगा कि लोगों को बांटने वाली नीतियों के बजाये उन्हें जोडने वाली बिल बनाये जाये। इन बिलों को भी अपने वेतन वृध्दि के बिल की तरह पूर्ण बहुमत से पारित किया जाये। इसी प्रकार से देश का विकास संभव है अन्यथा ऐसी स्थिति में देश को टूटते देर नहीं लगेगी। हो सकता है जिस देश को हम बडे र्गव से ‘भारत’ कह कर पुकारते हैं उसी राष्ट्र को ‘संयुक्त राष्ट्र भारत’ के नाम से न पुकारना पडे।

Monday, May 17, 2010


अमेरिका के बदले सुर

टाइम्स स्क्वेयर के हमले में पाकिस्तान का नाम आने से अमेरिका बौखला गया था। यहां तक की अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने यहां तक कह डाला था कि अगर इस मामले में पाकिस्तान का नाम की पुष्टि हो जाती है तो उसे इसके गंभीर नतीजे भुगतने पड सकते हैं।

मगर अब पाकिस्तान और आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका के तेवर बदले नजर आ रहे हैं। जहां उसे पहले धमकी दी जा रही थी वहीं अब पाकिस्तान की सराहना की जा रही है। हिलेरी क्लिंटन का एक और कदम उठाने की जरूरत है। बदले सुर में हिलेरी ने अल-कायदा और उसके चरंमपंथी सहियोगियों के खिलाफ पाकिस्तान कार्यवाही की करते हुए ये बात कही थी।

मगर देखा जाये तो ये बात कुछ हजम नहीं हुई क्योंकि अभी कुछ ही दिनों पहले जो अमेरिका पाकिस्तान को सीधे तौर पर धमकी दे रहा था वही अमेरिका गिरगिट की तरह रंग बदल अब उसकी तारीफ कर रहा है। कहीं सुर में ये बदलाव चीन के वजह से तो नहीं है। क्योंकि जब चीन ने पाकिस्तान को परमाणु सहायता की बात की थी तब भी अंतराष्ट्रिय बिरादरी मौन बनी हुई थी। यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि जब पाकिस्तान ने अमेरिका को भारत की तरह परमाणु संधि को कहा था तब उसने मना कर दिया था।

हवाला से मिली थी हमले की रकम

दुनिया के चैरहे पर हमले के लिये शहजाद को रकम हवाला के जरिये मुहैया करवाये गये थे। इस बात का खुलासा पाकिस्तान के तीन नगरिकों की गिरफतारी के बाद हुआ है।

एफबीआई ने शहजाद के आर्थिक संपर्कों का पता लगाते हुए पश्चिमोत्तर अमेरिका में एशियाई बहुत लांग आईलैंड, बोस्टन सबर्ब और न्यूजार्सी में छापे मारे हैं। इसी दौरान तीन पाकिस्तानी नागरिकों को गिरफतार किया गया। इनमें से दो को बोस्टन से और एक को मेन शहर से गिरफतार किया गया। अमेरिकी अटार्नी जनरल एरिक होल्डर ने कहा कि ये गिरफतारियां जांच का हिस्सा थी। उन्होंने साथ में यह भी कहा कि ये गिरफतारियां किसी नये खतरे की तरफ इशारा नहीं करते बल्कि इन्हें इस लिये गिरफतार किया गया क्योंकि इनके रिश्ते शहजाद के साथ थे। लेकिन हम यह भरोसे से नहीं कह सकते हैं कि ये रिश्ते कैसे हैं। गिरफतार नागरिकों पर इमिग्रेशन नियमों के उल्लंघन का भी आरोप है।

अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक ये गिरफतारियां एक शक्स के पूछताछ के बाद हुई हैं। इस शक्स की पहचान गुप्त रखी गई है और इसने खुद को शहजाद का साथी बताया है।

Sunday, May 16, 2010


अभी नहीं ठंडाया कोबाल्ट-60

अभी तक कोबाल्ट - 60 का मामला ठंडाया नहीं लगता। दरअसल 28 के बाद जब से इस मामले में दिल्ली यूनिवर्सिटी का नाम सामने आया है तब से इस मामले ने और उछाल पकडा है।

इस मामले पर अटामिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (एईआरबी) और दिल्ली पुलिस ने डीयू प्रशासन को एक नोटिस भेजा था। डीयू प्रशासन ने एईआरबी को जवाब दे दिया लेकिन पुलिस द्वारा भेजे गये नोटिस का जवाब अभी तक नहीं आया। हालांकी डीयू प्रशासन ने नोटिस का जवाब देने के लिये थोडा सा वक्त मांगा था जिसे दिल्ली पुलिस ने मंजूर कर लिया था। लेकिन 15 दिन बीत जाने के बाद भी डीयू प्रशासन की ओर से कोई जवाब न पाकर दिल्ली पुलिस ने उन्हें रिमाइंडर नोटिस भेजने का फैसला किया है।

पुलिस के डीसीपी (वेस्ट डिस्ट्रिक) शरद अग्रवाल ने नोटिस डीयू के वीसी से गामा सेल की नीलामी प्रक्रिया के बारे में पूरी जानकारी देने के लिये कहा था। साथ ही साथ पूछा गया था कि इस मामले में एईआरबी की सेफ्टी गाइडलाइंस की अनदेखी क्यों की गई और इसके लिये कौन जिम्मेदार है। पुलिस एईआरबी को भी एक पत्र लिखकर सलाह भी मांगी है कि इस मामाले में रेडियोएक्टिव पदार्थों के उपयोग से संबधित किस किस तरह के कानूनों का उल्लंघन हुआ है। फिलहाल तो इस संबंध में पुलिस ने मायापुरी थाने में केवल लापरवाही से हुई मौतों की धाराओं के तहत केस र्दज किया है, लेकिन यह मामला उतना सामान्य नहीं जितना की दिखता है।

नितिन गडकरी का बेबाक बयान

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी द्वारा लालू और मुलायम पर दिये एक बयान से राजनितिक गलियारों में हडकंप मच गया है। गडकरी ने अपने बयान में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और आर जे डी प्रमुख लालू प्रसाद यादव को कांग्रेस और सोनिया गांधी के तलवे चाटने वाला बताया है। उन्होंने कहा कि ‘‘वे शेर जैसे दहाडने की बातें करते थे लेकिन Û Û की तरह सोनिया और कांग्रेस के घर जा कर तलवे चाटने लगे’’। गडकरी ने ये बयान चंडीगढ में एक रैली को संबोधित करते हुए दिया था। अपने बयान में लालू और मुलायम के लिये गडकरी ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जिसे लिखना उचित नहीं होगा। इसे भारतीय नेताओं की बदजबानी के रूप में देखें ता ज्यादा उचित होगा। अपने इसी भाषण में गडकरी ने काटौती प्रस्ताव के दौरान लालू और मुलायम के लोकसभा से वाकआउट का जिक्र किया और कहा, ‘‘मुलायम सिंह और लालू प्रासद यादव जो यूपीए और सरकार के विरोध की बातें करते हैं, वे भी सीबीआई के सामने जा कर झुक गये।