Monday, November 29, 2010

क्या हमने भ्रश्टाचार को अपना लिया है?

क्या हमने भ्रश्टाचार को अपना लिया है, सवाल छोटा मगर बेहद जटिल और हमारी समाजिक जड़ों को हिलाने वाला है। आप भले ही इसे झूठ कहें लेकिन वास्तविक्ता तो यही है कि हमने भ्रश्टाचार को अपने जिन्दगी में अपना लिया है और अब हमारा प्रतिक्रिया इसके प्रति उतनी सजग नहीं रही जितनी की एक द ाक पहले हुआ करती थी। कहा जा सकता है कि हम अब परिपक्व हो गये हैं। हमारे अंदर यह परिपक्वता भाायद इस लिये भी आ गई है क्यों कि हम भ्रश्टाचार के आदि हो चुके हैंं। अभी हाल की ही बात ले लीजिये, कुछ ही दिनों पहले कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़े भ्रश्टाचार के मामले का हल सरकार निकाल ही नहीं पायी थी कि उसके बाद आर्द ा सोसाइटि घोटाला, २ जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आ गया। र्वतमान हालात को देखते हुए ऐसा लगता है कि जैसे घोटालों का परदाफा ा करने के लिये एक बयार सी चली हो जो सारे घोटालों की परते उधेड़ती जा रही है।
लेकिन अगर भ्रश्टाचार के प्रति हमारी उदासीनता का सकारात्मक पहलू देखें तो अब सरकारें इसके नाम पर वोटों की फसल नहीं काट सकती हैं। ऐसा इस लिये है क्यों कि हम वह भली भंती जान चुके हैं कि चाहे वह कोई भी पार्टी हो, उसके दामन भी भ्रश्टाचार के दागों से बचे नहीं हैं। आखिर कार चोर चोर मौसेरे भाई जो होते हैं।
खास बात यह है कि ये उदासीनता हमारे दो रवैयों को प्रस्तुत करती है। पहला यह कि अब हम भ्रश्टाचार से ऊब गये हैं क्यों कि हमने यह मान लिया है कि ऐसा तो होना ही है। दूसरा पहलू यह है कि हमारा मध्ययम वर्गीय समाज की दिलचस्पी राजनीति की ओर न हो कर अपने भविश्य, महंगाई और रोज मर्रा के कामों में भागते बीतती है। रही बात गरीब तबके की या उनकी जो गावों में रहते हैं, उन्हें तो चुनावों के दौरान कुछ रूपयों, उपहारों, भाराब की बोतलों और बिरयानी की पैकटों से आसानी से खरीदी जा सकता है और जो की असल जिन्दगी में किसी से छिपा नहीं है।
ल्ेिकन पूरे दे ा की जड़ों में आपनी पैठ बना चुकी इस भ्रश्टाचार के लिये हम सिर्फ सरकारों और न्यायिक प्रक्रिया को दोशी नहीं ठहराया जा सकता। वास्तविक्ता यह है कि हम भी इस भ्रश्टाचार के विस्तार में बराबर के दोशी हैं। हमने अपने और दूसरों के लिये भ्रश्टाचार की दो परिभाशाऐं, दो मानक बना रखें हैं। यदि भ्रश्टाचार से हमें फायदा हो रहा है तो वह सही है और भ्रश्टाचार नहीं है और कहीं अगर नुक्सान या गलत हो रहा हो तो वह भ्रश्टाचार है। फलस्वरूप हम उसके लिये हायतौबा मचाने लगते हैं।
विद्वानों के बीच में अरसे यह मुददा सुर्खियों में रहा है और इसके हल के लिये तीन उपाय सुझाये हैं जो कि मेरे विचार से व्यर्थ हैं। तीन में से एक तरीका जो सुझाया गया वह है 'सख्त कानून व्यवस्था और केसों का तेज निपटारा।` जहां यह सुझाव हमारी लोचपूर्ण और लचर न्याय व्यवस्था की ओर इ ाारा करता है वहीं एक सवाल भी खड़ा करता है कि जब र्वतमान परिपेक्ष में गवाहों और सबूतो को आसानी से खरीदा या मिटाया जा सकता है तो क्या यही केसों के तेज निपटारे के वक्त नहीं होगा? मुझे नहीं लगता कि यह कोई असम्भव कार्य है। दूसरा तरीका जो सुझाया गया वह यह कि सरकारी कार्यों में पारदि र्ाता का स्तर इतना बढ़ा दिया जाये कि सब कुछ लोगों की आंखों के सामने हो। मेरे विचार से भाायद इसी सुझाव पर काम करते हुए सरकार ने सूचना का अधिकार कानून को अस्तित्व में लाई थी जिसने सरकारी कार्यों में पारदि र्ाता का स्तर काफी बढ़ा दिया है। लेकिन वास्तविक्ता यह है कि यह अधिकार भी एक हद पर जा के समाप्त हो जाता है। तीसरा सुझाव था कि लोगों को भ्रश्टाचार के प्रति जागरूक बनाया जाये ताकि वे उसके खिलाफ उचित कदम उठा सकें। मैं अगर सही कहंू तो सबसे ज्यादा ना उम्मीद मुझे इसी सुझाव ने किया है क्योंकि जब हमने भश्टाचार को अपना रखा है तो उसे कैसे हटा सकते हैं। यह एक कटु सत्य है कि अपने अपने स्तर पर हम सभी भ्रश्ट हैं और उसे बढ़ावा देते हैं।
लेकिन जो सबसे डरावना पहलू है वह यह है कि जब किसी समाज में भ्रश्टाचार को अपने लिये जाता है तो उस समाज में भ्रश्टाचार की कोई सीमा नहीं रह जाती है और जिसे रोकना नामुमकिन हो जाता है। मेरा यह लेख सीधे तौर पर दे ा की एक भयावह चेहरा प्रस्तुत कर रहा है लेकिन वास्तविक्ता यही है।
बिहार का जनमत

अभी हाल ही में हुये बिहार विधान सभा चुनावों में नितीश कुमार और भाजपा गठबंधन ने दोबारा बाजी मार ली है। ऐेसा जनमत तो स्वभाविक था लेकिन लागों का इतना झुकाव और सर्मथन का सपना तो नितीश ने भी नहीं देखा होगा और इसमें कोई शक नहीं कि दोनों ही खुशी से फूले नहीं समा रहे होंगे। ऐसा होना भी चाहिये था क्योंकि बिहार में नितीश ने वो कर के दिखाया था जो कि प्रदेश के इतिहास में कभी नहीं हुआ। हां लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के वक्त बिहार आगे तो नहीं आया लेकिन १५-२० साल पीछे जरूर चला गया। एक वक्त था जब बिहार में यह कहावत प्रचलित थी 'जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक रहेगा बिहार में लालू।` आज समोसे में आलू तो है लेकिन बिहार में लालू नहीं। पिछली बार की तरह इस बार भी चुनावों में लालू प्रसाद यादव को मुंह की खानी पड़ी लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछली बार तो कम लेकिन इस बार कहीं ज्यादा खानी पड़ी है।
बिहार में राजनीतिक समीकरणों के बदलने की वजह साफ है, अब बिहार की जनता उन्नती चाहती है। अब उसे और बरगलाना किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिये आसान न होगा जो कि इस बार के जनाधार से साफ हो गया है। बिहार की जनता का यह स्भाव स्भाविक भी है, जब सब आगे बढ़ रहे हैं तो बिहार आखिर पिछड़ेपन की मार कब तक झेलता रहेगा? कब तक उसके साथ सौतेलों सरीके व्याहार होता रहेगा? बिहार के पिछड़ेपन की गवाही सिर्फ लोग ही नहीं बल्कि आंकड़े भी कुछ इसी ओर ईशारा करते हैं। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या फिर कोई और, बिहार अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे खड़ा नजर आता है। अगर प्रति व्यक्ति आय की बात की जाये तो पूरे देश की प्रति व्यक्ति आय जहां ४० से ५० हजार सालाना के बीच है वहीं बिहार की १३ हजार से कुछ अधिक पर दम तोड़ देती है।
अगर बिहार और उसके लोगों के साथ हुए सौतेलेपन की बात करें तो दोनों ही राजनीतिक और व्यक्तिगत तौर पर बिहार के साथ काफी अन्याय हुआ है। कई पंच वर्षिय योजनाओं में प्रदेश को केंद्र से पूरा पैसे हासिल नहीं हुये और व्यक्तिगत तौर पर बिहार के नागरिकों के साथ महाराष्ट्र, दिल्ली और देश के अन्य राज्यों में कैसा व्योहार होता है जग जाहिर है। पिछले दशकों में बिहार में कोई नया उद्योग नहीं लगा और जिन्होंने प्रदेश में निवेश किया था वे भी जाते रहे। अब जब नितीश को जनता ने दोबारा चुन कर मुख्यमंत्री के पद पर बैठाया है तो उनके पास वापिस से पांच साल का वक्त उस नींव पर ईमारत खड़ी करने के लिये जो कि उन्होंने पिछले पांच सालों मंे अपने कार्यकाल के दौरान डाली थी।

Tuesday, November 16, 2010

दिल्ली मेट्रो- महिला आरक्षण, सुविधा एक असुविधा अनेक

२ अक्टूबर से दिल्ली मेट्रो ने महिलाओं की सुविधा के लिहाज से ट्रेन के पहले कोच को आरक्षित कर दिया है। इस कोच में पुरूषों का प्रवेश निषद ह्रै। शेष तीन कोच पहले की तरह सभी के लिये है अर्थात इन कोचों में पुरूष और महिला दोनों ही एक साथ सफर कर सकते हैं।

दिल्लों मेट्रो ने यह कदम ट्रन में महिलाओं के साथ हुई छेड़ छाड़ की घटनाओं के बाद उठाया है। इस कदम से जहां महिलाओं को सुविधा हुई है वहीं इसकी वजह से कई असुविधाओं ने भी जन्म लिया है। यह असुविधाऐं दानों ही महिलाओं और पुरूषों को वहन करनी पड़ रही है। इन समस्याओं में से कुछ पहले की तरह विद्यमान हैं वहीं कुछ नये उतपन्न हुये हैं। मेरे कहने का तात्पर्य है कि महिलाओं के साथ होने वाली घटनाएं अब भी हो रही हैं, हलांकि इनमें थोड़ी कमी जरूर आयी हैं। लेकिन जो परिवर्तन देखने में आया है वह थोड़ा अजीब है। जहां पहले महिलाओं के साथ छेड़ छाड़ की घटनाओं में पुरूषों की सहानभूति और सहायता मिलती थी वह अब नदारद है। अब यदि कोई व्यक्ति महिला के साथ छेड़ छाड़ की घटना को अंजाम देता है तो सह पुरूष यात्री उसका विरोध करने की जगह तमाशबीन बने रहते हैं। अगर किसी महिला ने विराध किया तो उन्हें बड़े ही असभ्य तरीके से सुनने को मिलता है ''अगर आपको ज्यादा परेशानी हो रही है तो आप लेडीज कोच में क्यों नहीं चली जाती हैं।`` महिलाओं के साथ हुए इस असभ्य व्योहार को पुरूषों का मौन समर्थन मिलता है और बार की तरह महिला ही पिसती है।

मेट्रो की यह पहल पुरूषों और महिलाओं में एक प्रकार का लिंग भेदी स्थिति पैदा कर रही है जहां दोनों साथ हो कर भी साथ नहीं हैं। महिला के उत्तथान के कसीदे पढ़ने वाली सरकार को यह सोचने की आवश्यक्ता है ऐसे देश में जहां महिला और पुरूष के बीच की खाई पहले ही काफी ज्यादा है, जहां अब भी बेटीयों को बोझ समझा जाता है, उस देश में इस तरह के कदम कहां तक सही होंगे? यहां जरूरत उस पुरूष वर्ग को बदने की भी है जो नारी रूप में आदि शक्ति रूपी दुर्गा को पूजता है और उन्हें मां बुलाता है वही बाहर जा कर रावण सरीके हरकत हरता है।

Monday, November 15, 2010

कॉमनवेल्थ खेल और भारत की अस्मत

देश की राजधानी दिल्ली में १९ वां कॉमनवेल्थ खेल चल रहे हैं। इसी वजह से शहर की शक्ल सूरत बदली बदली दिख रही है। चाहे वह  सड़के हों, फलाईओवर हों, या फिर मेट्रो, हर जगह खेल अपना असर दिखा रहा है। लेकिन मानो अभी कल ही बात लगती है जब इन्हीं खेलों के आयोजन से संबंधित खामियों की गूंज देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सुनाई दे रही थी। हर जगह थू थू हो रही थी और शायद इसी वजह से सबको यह लग रहा था कि खेलों की मट्टी पलीत होनी तय है। हर जगह बदइन्तेजामी और भ्रष्टाचार ने अपनी काली छाप छोड़ रखी थी जो कि एक अंधे को भी साफ दिखाई दे जाती लेकिन सरकार को दिखाई नहीं दी।

दरअसल खेलों के आयोजन से जुड़े सभी सफेदपोश नेताओं और नौकरशाहों ने अपने पद और आयोजन के पैसे का गलत इस्तेमाल किया जिससे आयोजन का र्खच का बजट १७ प्रतिशत बढ़ कर करीब ७० हजार करोड़ तक जा पहुंचा। इस सारे गोरख धंधे में नेताओं और नौकर शाहों कि वेल्थ बनी और कॉमन आदमी को हर तरफ से परेशानी का सामना करना पड़ा। चाहे वह खाद्य सामग्रीे की आसमान छूती कीमतें हों या बसों और ऑटो के किरायों में हुई वृद्धी हो या फिर बिजली और पानी के किरायों में हुई वृद्धी हो, पिसा आम आदमी ही। इन सब वजहों से देश का कॉमन मैन यह सोचने पर मजबूर हो गया कि यह सब किसके लिये? क्या सरकार को यह नहीं दिख रहा कि इन नीतियों और करों के बोझ तले आम आदमी इतना दबता जा रहा कि उसका सांस लेना भी मुश्किल हो गया है।

इन सब बातों को नजर अंदाज होता गया और भ्रष्टाचार अपना शबाब दिखाते हुये चरम पर विद्यमान दिखा। जब इसकी खबरें भारत सहित विदेशी मीडिया में आने लगी तब कहीं जाकर सरकार को होश आया और आनन फानन में कुछ र्कायवाहीयां की गई। राष्ट्रमण्ड खेलों के आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाणी एंड़ कंपनी हिट लिस्ट में रही लेकिन इस मकड़ा जाल के कई और नामों का खुलासा होना बाकी है।

इन सब घटनाओं के परे ३ अक्टूबर को खेलों ने अपनी ही गति से दिल्ली के दरवाजे पर  दस्तक दे डाली। खेलों का आगाज़ कुछ इस सरीके हुआ कि पूरे विश्व की आंखें फटी की फटी रह गई। सबने यह देखा और जाना कि क्यों अब भारत को विश्व की तीसरी बड़ी शक्ति कहा जाने लगा है। खेलों का उदघाटन समारोह भव्य था और इसे अब तक का सबसे अच्छा उदघाटन समारोह की संज्ञा भी दी गई। देश विदेश के खिलाड़ी आये और भारत की प्राचीन परंपरा 'अतिथि देवा भव:` को जाना। उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रर्दशन देते हुए र्स्वण, रजत और कांस्य पदको पर अपना कबजा जमाया। इन खेलों ने दिल्ली में ही नहीं बल्कि पुरे हिन्दुस्तान में अपने रंगों की खूब छटा बिखेरी जिससे समुचा राष्ट्र रंगों से सराबोर हो उठा।

इसके साथ ही खेलों में भारत के दो चेहरे देखने को मिले। पहला वह चेहरा जिसने भारत की छवी को दाग दार किया और अपने कारगुजारियों के कारण खेलों के इतिहास में एक काला अध्याय बन गया। दूसरा वह भारत जिसके अथक प्रयासों ने समूचे विश्व के सामने भारत की लाज बचाई, देश का नाम रौशन किया और अपने बढ़िया प्रदर्शन के बदौलत खेलों में स्वर्ण, रजत और कांस्य पद जीत कर भारत की झोली में डाला। भारत का पहला चेहरा उन दागी नेताओं, नौकरशाहों और खेलों के दिये गये किट ले कर फरार वॉलंटिर्यस का है और वहीं दूसरा चेहरा खिलाड़ियों का है जो कई तरह के अभावों का शिकार होने के बावजूद न सिर्फ खेलों में भारत को पदक दिलाये बल्कि पद तालिका में राष्ट्र को दूसरे पायदान पर ले आये। दूसरा चेहरा उन खिलाड़ियों का भी है जो पद तो न ला सके मगर अपने अथक प्रयास से खेल भावना को सींचा। सबसे अफसोस जनक बात तो यह है कि भारत का पहला चेहरा दूरसे की वाहवाही लूटना चाहता है। वह चाहता है कि सारा श्रेय उसे मिल जाये लेकिन शायद वह यह भूल रहा है उसी की कारगुजारियों के कारण भारत की नाक नीची हो गई थी और अब जो बड़े ही मशक्कतों के बाद वापिस जुड़ी है।

इनहीं हालातों को मद्दे नजर रखते हुए सरकारें दोषियों को कड़ी सजा देना चाहिये। इस पर केन्द्र सरकार ने एक और कमेटी बनाई है जो कि केन्द्र को अपनी रीर्पोट तीन महीने के भीतर सौंप देगी। उम्मीद की जा सकती है कि सरकार के यह प्रयास भ्रष्टाचार के नाग के फन को कुचलने में कामयाब रहेंगे और ऐसा उदाहरण पेश करेंगे कि फिर कभी भी कोई देश की असमत के साथ खिलवाड़ न करे। केन्द्र और राज्य सरकारों को अपने स्तर पर खेलों के प्रोेतसाहन के लिये भी कदम आगे बढ़ाने होंगे जिससे खिलाड़ियों को और बेहतर प्रर्दशन करने के लिये प्रेरित करे जा कि अभावों में उतना नहीं हो पा रहा।

Friday, August 20, 2010



क्योंकि कुर्सी छूटती नहीं मुझसे



क्योंकि कुर्सी छूटती नहीं मुझसे
एक यही है जो कभी रूठती नहीं मुझसे
मैं बैठा रहूं यी नहीं, इसका मोह जाता नहीं 
अगर ना रहूं इस पर, ये पूछती है मुझसे

तुम फिर कब आओगे, फिर कब आओगे
भ्रष्टाचार के नये दीये फिर कब जलाओगे
जब तक हो चूस लो खून जनता का
अगर चले गये तो प्यास कैसे बुझाओगे

क्या लेना तुम्हें अपने राष्ट्र से
कानून अपना तो डरना किस बात से
जो उठे खिलाफ उसे तुम पिसवा देना
वो हिल्दू या मुस्लिम, तुम्हें क्या लेना जात से

कौन मरा 62,75,2000 में, क्या लेना उससे
जो मुझे पैसे दे, मुझे काम है उससे
मेरा भी घर है, परिवार चलाना है मुझे
जो वेतन है, क्या होता है उससे

देश भले गर्क में जाये, ईमानदारी न होगी मुझसे
अरे ऐसा कुछ बताओ, जो हो जाये मुझसे
मेरा तो बस नाता है राजनीति से
क्योंकि कुर्सी छूटती नहीं मुझसे

Monday, August 16, 2010



लालगढ़ में दिखी ममता

दिन सोमवार, तारीख 9 अगस्त 2010 और जगह माओवादीयों का गढ़ कहे जाने वाला लाल गढ़। केन्द्रिय रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्षा ममता बनर्जी ने लालगढ़ में माओवादियों से शान्ति के अनुरोध हेतु एक सभा आयोजित की जिसमें उनके साथ मंच पर माओवादियों के प्रति अपने दिलों में सहानुभूति और नरमी रखने वाले कुछ गैर सरकारी संगठन और कुछ लोग मंच पर मौजूद थे।

अपने भाषण में ममता बनर्जी ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ बातचीत की राह पकड़ने का आग्रह किया। बात यहां तक तो सही चलती रही लेकिन ममता ने अपने भाषण में कुछ ऐसा कह गई जिससे विपक्ष समेत देश का एक बड़ा बुद्वजीवी वर्ग की भौंऐ तन गई। ममता ने अपने भाषण में माओवादी नेता चेरूकुरी राजकुमार उर्फ आजाद की हत्या की गई।

लगता है ममता जी यह भूल गई हैं कि नक्सलियों द्वारा इतने लोग मारे गये हैं जितने कि आतंकवादी हमलों में नहीं मारे गये। मैं नहीं कहता कि माओवादियों से सहानुभूति रखना गलत है। आखिर उनके साथ अन्याय हुआ जिसके प्रतिशोध में उन्होंने हथियार उठा लिये मगर हर मुद्दे को राजनीतिक रूप देना कहां तक सही है। मैं नहीं कहता कि ममता बनर्जी की अनुरोध गलत है लकिन यह कहना कि आजाद की हत्या की गई गलत है क्योंकि इससे उन्हें और बल मिलेगा जो कि सही नहीं है।

Wednesday, July 14, 2010



कश्मीर और भारत

कश्मीर, भारत कर ताज, भारत का स्वर्ग और न जाने किन किन नामों से हम संबोधित करते रहे हैं। यहां की डल ऋझील और गृह नौकाएं, बर्फ के पहाड़ और चारो तरफ हरी भरी छटा हमेशा से अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। इन मनमोहक नजारों को मैंने और आपने फिल्मों में भी खूब देखा होगा और जिन लोगों को यहां आने का मौका मिला उनके लिये ये सोने पे सुहागा जैसे बात रही होगी। मगर जब से आतंकवाद ने अपने कदम वहां रखे तब से कश्मीर की फिजाओं में मानो ज़हर घुल गया हो।  इस पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने वहां ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि लोग वहां जाने से कतराने लगे। हालात को नियंत्रित करने के उद्येश्य से वहां सेना भी मौके बेमौके आती रही है और आतंकवाद रूपी नाग के न केवल दांत तोड़ती बल्कि फन भी कुचलती रही है।

बीच में कवायद रंग लाई और कश्मीर के हालात सुधरने लगे थे और घाटी की पुकार फिर से लोगों के कानों में पड़ने लगी थी। इस बीच मैं भी अपने माता पिता के संग वहां हो आया। माहौल तो शांत था मगर लोंगों के चेहरे पर मौत के डर, खून और चीख पुकार की छाई खामोशी बखूबी देखी जा सकती थी। प्रमुख स्थलों और बाज़ारों में सुरक्षा बलों की टुकड़ीयां तैनात दिखी जो जाने अनजाने हमें हमेशा सजग रहने की हिदायत देती और वहां की घ्सटनाओं को याद दिलाती थी। मगर घाटी का शांत माहौल ज्यादा दिनों तक शांत नहीं रह पाया और एक बार फिर आतंकियों ने बंदूकों के साये तले आतंक का नंगा नाच फिर से शुरू कर दिया। सीआरपीएफ और पुलिस बल के जवान तो वहां कायम थे ही सेना के आने और जाने का सिलसिला बादस्तूर जारी था।

आतंकवाद से लड़ते लड़ते सुरक्षा बलों की आंखों ने इतना खून देख लिया कि शायद कि वे अपने और आतंकवादियों मंे ज़्यादा फर्क न कर पाये और कई अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे बैठे। आतंवाद के नाम पर वहां के बाशिंदों का फर्जी एनकाउंटर, अवैध हिरासत, बलातकार जैसी घटनाओं से अपने साफ छवी बेदाग न रख पाये और गंदी कर बैठे। सरकार का सारा ध्यान पाक प्रायोजित आतंकवाद पर था और है शायद इसी वजह से उसका ध्यान इस घटनाओं की ओर नहीं हो पाया। जब रक्षक भक्षक बन रहा था तब सरकारें आतंवाद से ग्रसित कश्मीर से चिंतित थी और उसे मुक्ति दिलाने के प्रयासों में लगी थी जो आज तक जारी है। इन्हीं सारी वजहों से आम जनता की भावनाये आहत होने लगी और वे खुद को सभी के बीच अकेला और असहज महसूस करने लगी। इस बीच खबरों का बाजार भी गरम रहा कि घाटी के नौजवान पाकिस्तान जा कर आतंकवादियों से हाथ मिला बैठे हैं और प्रशिक्षण ले कर भारत के ही खिलाफ हथियार उठा रहे हैं। शायद लोगों की ये प्रतिक्रिया उन्हीं आहत भावनाओं के फल स्वरूप रही होगी। मगर इसके से ही आत्मसमर्पण और वतन वापसी की खबरें भी आती रही। अभी हाल ही में ऐ वाक्या जो मुझे याद है वो ये कि एक शक्स जो लश्कर-ए-तैयबा में शामिल हो गया था, वहां के माहौल से परेशान हो कर वतन वापसी की राह में सीमा पार करते वक्त सुरक्षा बलों द्वारा पकड़ लिया गया। कई समाचार पत्रों ने उसका साक्षतकार भी छापा था जिसमें ये भी बताया गया कि उसके जैसे ही और भारतीय कश्मीरी नागरिक जो आतंकवादीयों के शिविरों में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं वे भी वतन वापसी की फिराक्त में हैं।

ऐसा नहीं है कि कश्मीर घाटी में हालात अब सामान्य हैं। अलबत्ता वहां जन आक्रोष धीरे धीरे और बढ़ रहा है जिसने अपना रूप भी लेना प्रारंभ कर दिया है। इसका फायदा वहां के कुछ अलगाववादी संगठन और राजनीतिक पार्टीयां उठा रही हैं जिन्होंने वहां के नौजवानों को फुस्लाकर अपने गुटों में शामिल कर लिया है और अपने फायदे के लिये छोटे छोटे मुद्दे बना कर उन्हें सड़को पर भारी हंगामा करने उतार देती हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले ऐसे हालात सामने आये थे जहां पुलिस बल और ऐसे संगठनों से जुडे़ युवाओं के बीच झड़प देखी गई। यह भी बता दें कि ये राजनीतिक  पार्टीयां और अलगाववादी संगठन अपने अपने संगठनों से जुड़े यूवाओं को वेतन भी मुहैया करवाते हैं जिससे ये वहां युवाओं के बीच रोज़गार का साधन के रूप में भी अपनी जड़ बना रहा है। इन्हीं झड़पों के क्रम में कुछ ही महीनों के अंतराल के बाद एक और वाक्या सामने आया जो इतना बढ़ गया कि वहां कफर््यू लगानी पड़ी। इस दौरान भी झड़पों का सिलसिला कायम रहा जिसेमें कुछ लोगों की सीआरपीएफ की गोलियों से मौत हो गई। पिछली बार की तरह इस बार भी अलगाववादी संगठनों और हुर्रियत कानफ्रंस ने मौके का फायदा उठाने की कोशिश की। यहां यह भी बताते चलें कि हुर्रियत कानफ्रंस की आतंकी संगठनों से रिशते जग जाहिर हैं। उनकी इस कवायद का हिस्सा आतंकवाद को भीड़ में शामिल करना था जिससे मरने वालों की संख्या में और इज़ाफा हो सके। इस पहल से आतंकवाद को एक नया चेहरा देने की कोशिश थी जिससे मरने वालों की संख्या में भारी इज़ाफा किया जा सके और भारत की छवी पर दाग लगाया जा सके। इसका सीधा फायदा पाकिस्तान को मिलता जिससे वह एक बार फिर आरोप लगाने और आतंकवाद और कश्मीर जैसे अहम मुद्दों से भटका सके।

हलांकि कफर््यू हटा ली गई है लेकिन अब भी इससे गेरेज़ नहीं किया जा सकता कि घाटी के हालात अब भी काफी बिगड़े हुए हैं। लेकिन यहां पर सवाल इस बात का नहीं है कि हालात कितने दिनों तक सामान्य बने रहते हैं बल्कि ये है कि लोगों के दिलों में पल रहे तूफान को कैसे शांत किया जाये और उनके साथ हुए अन्याय के लिये उन्हें क्या न्याय मिले और कैसे सुनिश्चित किया जाये कि आगामी भविष्य में उनके साथ ऐसी कोई घटना नहींे होगी। ये सवाल सिर्फ उमर सरकार की नहीं है बल्कि इसके लिये कारगर कदल की पहल केन्द्र को करनी होगी। केन्द्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके द्वारा उठाये कदमों का पालन भी हो। यहां पर ज़रूरी होगा कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इन्हें मुद्दा न बाये जिस पर वे अपनी रोटीयां सेकें। इन सब प्रयासों में मीडिया की भी भूमिका होनी चाहिये जिससे कि वह अपने कलम और कैमरों की सहायता से सरकार और अलगाववादी संगठनों पर अपनी पैनी नज़र बनाये रखे।